Principal, Adarsh college, hardua nawabganj

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ इस मूलमंत्र से अनुप्राणित एवं ‘विद्या धर्मेण शोभते’ के संकल्प से संकल्पित, नवोदित शिक्षण संस्थानों में अग्रणी शिक्षा के इस पावन मंदिर में प्रवेश करने पर आपका हार्दिक स्वागत है। आपके इस वर्ष आगमन तक यह शिक्षा मंदिर अपनी स्थापना के बाईस वर्ष पूर्ण कर प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

शिक्षा वह प्रक्रिया है , जो व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु – पर्यन्त तक चलती है। अतः मनुष्य इस गतिशील प्रक्रिया के माध्यम से कुछ न कुछ सीख कर अपने जीवन में विकास की चरम सीमा तक पहुंचने का प्रयास करता है। इस प्रयास का आरम्भ सर्वप्रथम उसके अपने परिवार से होता है , जिसमें प्रथम गुरु उसकी माँ होती है। तत्पश्चात वह विद्यालयी शिक्षा ग्रहण करने विद्यालय जाता है , जहाँ वह गुरु के संपर्क में आता है। फिर व्यक्ति समाज के माध्यम से निरंतर कुछ न कुछ शिक्षा ग्रहण करता रहता है।

शिक्षा के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने अपने विभिन्न मत दिए है। शिक्षा के लिए विद्या एवं ज्ञान शब्दों का प्रयोग भी किया जाता है। ईशोपनिषद के अनुसार , “विद्या से आशय उस ज्ञान से है , जिसको प्राप्त करने के पश्चात् कुछ जानना शेष नहीं रह जाता , इस ज्ञान को आत्मज्ञान कहते है। ” संस्कृत साहित्य में विद्या की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए है –
“विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं, प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।विद्या भोगकरी यशः सुखकरी, विद्या गुरुणां गुरुः।।”
अर्थात विद्या मनुष्य का सुन्दर रूप है , विद्या अत्यंत गुप्त धन है , विद्या सुखोपभोग देने वाली है , विद्या गुरुओं की गुरु है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में , “मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। “

महाविद्यालय में आपने भले ही एक व्यक्ति के रूप में प्रवेश लिया है परन्तु प्रवेश लेने के साथ ही आप मात्र एक व्यक्ति न रहकर पूरी संस्था का रूप धारण कर चुके है। आपकी प्रत्येक गतिविधि व व्यवहार से ही समाज अब इस संस्था के स्वरूप व् कार्यविधियों से परिचित होगा। आपका व्यवहार , आपकी योग्यता व आपकी अन्य रचनात्मक गतिविधियाँ यद्यपि विराट रूप में आपकी अपनी है , लेकिन सूक्ष्म रूप में इसमें विद्यालय के गौरव का भी प्रश्न जुड़ा है। विद्याध्ययन की साधना में रत रहने की मनोवृत्ति लेकर आये साधक विद्यार्थियों को मेरा यह सुझाव है कि प्रवेश के समय ही आप इस संस्था के गौरव व मान की वृद्धि करने का दृढ़ संकल्प लें , जो इसमें अध्ययनरत रहने के दिनों में इस संस्था का आप पर ऋण होगा और उस ऋण से निवृत्त होना आपका परम धर्म।

अध्ययन , अध्यापन और अनुशासन की त्रयी हमारे विद्यालय की परंपरा है। सीमित संशाधनों के मध्य प्रारम्भ हुए इस महाविद्यालय में अध्ययन – अध्यापन सम्बन्धी सभी सुविधायें उपलब्ध है। समस्त विद्वान शिक्षक आपकी समस्त चिंतन अभीप्सा को संतुष्ट करने हेतु कृत संकल्पित है और सक्षम प्रशासन सीमित संशाधनों के मध्य भी सभी आवश्यक सुविधाओं को सुरुचिपूर्ण स्तर तक उपलब्ध कराने के लिए प्रयत्नशील है। महाविद्यालय में अनावश्यक व्यवधान उत्पन्न करने वाले तत्वों का कोई अस्तित्व नहीं है। लेकिन छात्रों की जनतन्त्रात्मक भावनाओं के प्रति हम संवेदनशील है। इस निमित्त महाविद्यालय में प्रवक्ताओं के संरक्षण में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को समाहित कर एक “छात्र कल्याण समिति ” का भी गठन किया गया है। एक ही परिवार का अंग होने के कारण हम विद्यार्थियों के प्रति स्नेह का भरपूर वातावरण बनाये रखने के लिए प्रयत्न शील रहते है , परन्तु विद्यार्थियों द्वारा इस पारिवारिक भाव को समाप्त करने हेतु की जाने वाली अप्रिय व अनुशाशनहीनता से परिपूर्ण कार्यवाहियों को हम दण्डित करने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करते।
मैं आशा करता हूँ कि आप अध्ययन को अपना मूलमंत्र मान कर अपनी उच्च शिक्षा पूर्ण करेंगे और समाज में अपनी सार्थकता सिद्ध करते हुए महाविद्यालय के “आदर्श” नाम को भी सार्थक सिद्ध करेंगे।
आपके सुयशपूर्ण जीवन की कामना करता हुआ !

डॉ0 आनन्द कुमार पाठक
प्राचार्य
मो. – 9412586700